⭕ पुष्करणा सावे में गूंजा बीकानेर, विष्णुरूपी दूल्हों का अलौकिक सम्मान
बीबीएन,बीकानेर। पुष्करणा सावे का शुभ अवसर इस बार बीकानेर की स्मृतियों में एक जीवंत सांस्कृतिक दृश्य की तरह अंकित हो गया। जब विष्णुरूपी वेश में सुसज्जित दूल्हे अपनी-अपनी बारातों के साथ शहर की गलियों से गुज़रे, तब मानो परंपरा स्वयं चलकर वर्तमान में उतर आई हो। शंखनाद की गंभीर ध्वनि, झालरों की लय और लोकगीतों की मधुरता ने रात को उत्सव की उजली चादर से ढक दिया। सामाजिक संस्थाओं द्वारा दूल्हों के सम्मान और जनसहभागिता की व्यापक उपस्थिति ने इस आयोजन को केवल विवाह संस्कार न रहने देकर सामूहिक सांस्कृतिक उत्सव में रूपांतरित कर दिया।
शुभ मुहूर्त के साथ आरंभ हुई बारातों की यह श्रृंखला देर रात्रि तक निरंतर चलती रही। कहीं सादगीपूर्ण पदयात्रा में विष्णुवेशधारी दूल्हे शांत गरिमा के साथ आगे बढ़ते दिखे, तो कहीं पारंपरिक वाद्यों, रथ और सज्जित घोड़ी के साथ उल्लास का विस्तार दिखाई दिया। मार्गों के दोनों ओर खड़े नागरिकों की पुष्पवर्षा ने इस दृश्य को श्रद्धा और अपनत्व से भर दिया।
विवाह से पूर्व की पारंपरिक रस्में—बड़बेला, आटी, दूध पिलाने की विधि और खिरोड़ा—समाज की सांस्कृतिक स्मृति को पुनर्जीवित करती प्रतीत हुईं। गोत्राचार के सार्वजनिक वाचन के साथ लिया गया कन्यादान का संकल्प पीढ़ियों से चली आ रही आस्थाओं की निरंतरता का साक्षी बना। दुल्हों के स्वागत में महिलाओं द्वारा गाए गए तालोटा गीतों ने वातावरण में भावनात्मक कोमलता घोल दी, मानो लोकस्वर स्वयं आशीर्वाद बनकर उतर आए हों।
शहर के चौक-चौराहों पर बारातियों के लिए किए गए स्वागत प्रबंध, स्वयंसेवकों और प्रशासन की सजग व्यवस्था तथा लोगों द्वारा डिजिटल माध्यमों में इन क्षणों को संजोने का प्रयास—इन सबने मिलकर परंपरा और आधुनिकता के सहज संगम का चित्र उपस्थित किया। सामाजिक संगठनों ने विष्णुवेशधारी दूल्हों को मोटरसाइकिल, घरेलू उपकरण, नकद राशि और विविध उपहार देकर सम्मानित किया। महिला और पुरुष बारातियों का पारंपरिक सत्कार तथा बाल स्वरूप में सजे दूल्हों की मोहक उपस्थिति आयोजन के विशेष आकर्षण बने।
यह समूचा उत्सव केवल एक सामाजिक अनुष्ठान नहीं रहा, बल्कि बीकानेर की सांस्कृतिक चेतना, सामुदायिक एकता और जीवित परंपराओं का ऐसा उज्ज्वल दृश्य बनकर उभरा, जिसमें अतीत की गरिमा और वर्तमान का उल्लास एक साथ स्पंदित होते दिखाई दिए।



