बीबीएन, नेटवर्क। राजधानी जयपुर में एक ऐसे सनसनीखेज साइबर घोटाले का पर्दाफाश हुआ है, जिसने देश के एक्सपोर्ट सुरक्षा तंत्र की सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। इसे महज एक ठगी नहीं, बल्कि एक ‘डिजिटल हाइजैकिंग’ कहा जा रहा है, जिसमें बिना किसी भौतिक सेंधमारी के, केवल फर्जी दस्तावेजों के दम पर सरकारी खजाने से 400 करोड़ रुपये पार कर दिए गए। जयपुर पुलिस ने इस अंतर्राज्यीय सिंडिकेट का भंडाफोड़ करते हुए बताया कि कैसे दुबई में बैठा एक मास्टरमाइंड भारत की सैकड़ों कंपनियों की डिजिटल पहचान (DSC) का सौदा कर रहा था।
फर्जी डिजिटल चाबी से खुला खजाना
इस घोटाले की कार्यप्रणाली किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। जांच में सामने आया है कि अपराधियों ने सबसे पहले बड़ी कंपनियों के निदेशकों के फर्जी आधार और पैन कार्ड तैयार किए। इन जाली दस्तावेजों के आधार पर डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) हासिल किए गए, जो किसी भी डिजिटल लेन-देन की ‘प्रमाणित चाबी’ होती है। एक बार जब असली मालिकों की डिजिटल पहचान पर कब्जा हो गया, तो अपराधियों ने ‘डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड’ (DGFT) पोर्टल पर लॉगिन किया। वहां सेंध लगाते ही असली मालिकों के मोबाइल नंबर और ईमेल हटाकर गिरोह ने अपनी जानकारी अपडेट कर दी। इसके बाद शुरू हुआ सरकारी सब्सिडी और टैक्स छूट के पैसों का ‘डायवर्जन’।
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सेंधमारी का ‘चार-चरणीय’ मॉड्यूल
पुलिस की तफ्तीश के मुताबिक, इस सिंडिकेट ने बेहद पेशेवर तरीके से काम किया:
पहचान की चोरी: जाली केवाईसी (KYC) के जरिए फर्जी DSC का निर्माण।
पोर्टल का पूर्ण नियंत्रण: DGFT पोर्टल पर असली डेटा को बदलकर अपना डेटा फीड करना।
ड्यूटी क्रेडिट की निकासी: ICEGATE के माध्यम से निर्यातकों को मिलने वाली RODTEP और ROSCTL जैसी सरकारी रियायतों को फर्जी खातों में ट्रांसफर करना।
दिल्ली के बाजार में लॉन्ड्रिंग: इन डिजिटल स्क्रिप्ट्स को दिल्ली के बिचौलियों के माध्यम से बेचकर पैसा ‘म्यूल अकाउंट्स’ में घुमाना।
चौंकाने वाला तथ्य: केवाईसी सत्यापन की लापरवाही का आलम यह था कि एक महिला के नाम के दस्तावेज पर पुरुष की फोटो लगाकर भी डिजिटल सिग्नेचर हासिल कर लिए गए। जांच में पाया गया कि महज एक फर्जी सिग्नेचर से 93 लाख रुपये की चपत लगाई गई।
दुबई से संचालित हो रहा था ‘कंट्रोल रूम’
इस मामले में सबसे गंभीर पहलू इसका अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन है। जयपुर पुलिस ने अब तक जोधपुर और पाली से 5 तकनीकी विशेषज्ञों को गिरफ्तार किया है, जो फर्जी DSC बनाने में माहिर हैं। लेकिन इस खेल का रिमोट कंट्रोल दुबई में है। पकड़े गए आरोपियों ने कबूल किया है कि फर्जी DSC दुबई में डाउनलोड किए जाते थे, ताकि भारतीय जांच एजेंसियां आईपी एड्रेस (IP Address) को ट्रेस न कर सकें। इस गिरोह में करीब 15 और तकनीकी विशेषज्ञों के शामिल होने की आशंका है।
सिस्टम की सुरक्षा पर सवालिया निशान
400 करोड़ की इस “डिजिटल डकैती” ने केंद्र सरकार के दो सबसे महत्वपूर्ण पोर्टल्स—DGFT और ICEGATE की अभेद्यता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कागजी केवाईसी (KYC) का सत्यापन केवल एक औपचारिकता बना रहेगा, तो देश का निर्यात ढांचा कभी सुरक्षित नहीं रह पाएगा। पुलिस अब इस सिंडिकेट के उन ‘स्लीपर सेल’ की तलाश कर रही है, जो दिल्ली के बाजारों में इन चोरी की गई स्क्रिप्ट्स को खपाने का काम करते थे।




