बीबीएन, बीकानेर। पश्चिमी सीमा एक बार फिर खौफनाक साजिशों की ज़द्द में है। बीकानेर रेंज के हनुमानगढ़ जिले को लेकर हुई आतंकी साजिश ने एक बार फिर बड़ी नापाक हरकत की ओर साफ़ इशारा करते हुए “ख़ुफ़िया तंत्र” की नींद उड़ा दी है।
हक़ीक़त यह है कि हनुमानगढ़ में संदिग्ध आतंकी गतिविधियों और सीमा पार से ड्रोन के जरिए हथियारों की निरंतर सप्लाई ने बीकानेर रेंज की सुरक्षा व्यवस्था पर ऐसे तीखे सवाल दाग दिए हैं, जिनका जवाब देने में प्रशासन के पसीने छूट रहे हैं। यह महज कोई इत्तेफाक नहीं, बल्कि सीमा पार बैठे आकाओं की एक सोची-समझी रणनीतिक बिसात है, जिसमें हनुमानगढ़, श्रीगंगानगर और बीकानेर जैसे संवेदनशील जिलों को स्लीपर सेल का सुरक्षित ठिकाना बनाया जा रहा है।
सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि जिस इलाके को अभेद्य दुर्ग समझा जाता था, वहां आतंक के आका ‘भट्टी’ जैसे किरदारों ने अपनी जड़ें इतनी गहरी जमा ली हैं कि अब पंजाब, हरियाणा और राजस्थान का यह संगम स्थल देशविरोधी ताकतों की ‘ऑपरेटिंग लैब’ बनता जा रहा है। कृषि प्रधान क्षेत्र की ओट, ढाणियों की बिखरी बसावट और बाहरी मजदूरों की भीड़ का फायदा उठाकर ये आतंकी तत्व स्थानीय तंत्र की आंखों में धूल झोंक रहे हैं, जो सीधे तौर पर हमारे खुफिया नेटवर्क की विफलता की ओर इशारा करता है।
अब सवाल यह नहीं है कि खतरा कितना बड़ा है, बल्कि सवाल यह है कि सुरक्षा एजेंसियां इस कैंसर को फैलने से रोकने में नाकाम क्यों रही हैं? बीकानेर रेंज के जिलों का आपसी संपर्क और पाकिस्तान सीमा से इनकी नजदीकी इस पूरे बेल्ट को एक ‘टाइम बम’ पर खड़ा कर देती है। यदि समय रहते इन स्लीपर सेल्स के जाल को जड़ से नहीं उखाड़ा गया, तो वह दिन दूर नहीं जब शांत दिखने वाला यह रेतीला धोरों का प्रदेश लहू-लुहान नजर आएगा।
प्रशासन की सुस्ती और कागजी चौकसी ने इन देशद्रोहियों को फलने-फूलने का मौका दिया है। अब केवल निगरानी बढ़ाने के खोखले दावों से काम नहीं चलेगा, बल्कि सीमावर्ती इलाकों में छिपे इन ‘आस्तीन के सांपों’ पर ऐसी कठोर और सर्जिकल कार्रवाई की दरकार है जो आने वाली नस्लों के लिए नजीर बन सके।
सरहद पर मंडराता यह खतरा केवल हनुमानगढ़ तक सीमित नहीं है, यह समूचे राष्ट्र की अखंडता को सीधी चुनौती है जिसे किसी भी सूरत में नजरअंदाज करना आत्मघाती साबित होगा।





