⭕ प्रकृति रक्षा के लिए अन्न-जल त्याग, कई अनशनकारी अस्पताल में भर्ती
बीबीएन, बीकानेर| रेगिस्तान के “कल्पवृक्ष” खेजड़ी के संरक्षण की मांग को लेकर चल रहा आमरण अनशन 36 घंटे पूरे कर चुका है। कलेक्ट्रेट परिसर में जारी इस आंदोलन में संतों के नेतृत्व में सैकड़ों लोग बिना अन्न और जल के डटे हुए हैं। महिलाओं की बड़ी भागीदारी के साथ यह आंदोलन अब केवल स्थानीय विरोध नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण को लेकर राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनता जा रहा है।
आंदोलन की खास बात इसका पूर्णतः शांत, अनुशासित और सांस्कृतिक स्वरूप है। सुबह संतों के सान्निध्य में खेजड़ी पूजन हुआ, जिसके बाद सभी अनशनकारी महाराजा गंगा सिंह की प्रतिमा के समीप स्थित खेजड़ी वृक्ष तक पहुंचे और सामूहिक प्रार्थना की। भजन-कीर्तन और मौन संकल्प के बीच आंदोलनकारियों ने स्पष्ट संदेश दिया कि उनकी मांगें प्रकृति और आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व से जुड़ी हैं।
हालांकि, अनशन का असर अब स्वास्थ्य पर दिखने लगा है। डाबला निवासी सुभाष की हालत बिगड़ने के बाद प्रशासन हरकत में आया। जिला प्रशासन ने वार्ता के प्रयास तेज करते हुए अस्थायी चिकित्सा व्यवस्था शुरू की। विश्नोई धर्मशाला में बनाए गए मेडिकल कैंप में 17 अनशनकारियों की जांच की गई, जिनमें से चार को पीबीएम अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एडीएम सिटी सहित प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। आंदोलन के दौरान चिकित्सा, व्यवस्था और सेवा का पूरा जिम्मा स्वयंसेवकों ने संभाला, वह भी बिना किसी अव्यवस्था या टकराव के। यह अनुशासन प्रशासन के लिए भी एक सकारात्मक उदाहरण बनकर सामने आया।
राज्य के विभिन्न हिस्सों से आए वक्ताओं ने अपने संबोधनों में सरकार से खेजड़ी संरक्षण को लेकर ठोस नीति और कानूनी सुरक्षा की मांग दोहराई। वक्ताओं का कहना है कि यदि पर्यावरणीय मुद्दों को लगातार नजरअंदाज किया गया, तो जनआंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच संवाद जारी है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है—क्या सरकार खेजड़ी जैसे जीवनदायिनी वृक्ष के संरक्षण के लिए निर्णायक कदम उठाएगी, या यह संघर्ष इतिहास के पन्नों में एक और चेतावनी बनकर दर्ज होगा।




