बीबीएन,बीकानेर। प्राचीन पाण्डुलिपियों में निहित ज्ञान को आधुनिक तकनीक के सहारे नए युग तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में बीकानेर में शनिवार से दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन आरम्भ हुआ। राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान द्वारा आयोजित इस सम्मेलन का विषय ‘पाण्डुलिपियों के अध्ययन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता की उपयोगिता’ है। इसमें देश-विदेश के विद्वान, तकनीकी विशेषज्ञ और शोधकर्ता एक मंच पर एकत्र होकर इस बात पर विचार कर रहे हैं कि सदियों पुरानी ज्ञान-परंपरा को कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सहायता से किस प्रकार संरक्षित, समझा और व्यापक समाज तक पहुँचाया जा सकता है। यह सम्मेलन राजस्थान में इस विषय पर आयोजित होने वाला पहला अंतरराष्ट्रीय आयोजन माना जा रहा है, जिसमें प्रत्यक्ष उपस्थिति के साथ-साथ ऑनलाइन माध्यम से भी अनेक प्रतिभागी जुड़े हैं।
परंपरा और तकनीक के संगम पर विचार
सम्मेलन का शुभारंभ मुनि अमृतकुमार की सन्निधि में हुआ। अपने उद्बोधन में उन्होंने कहा कि ज्ञान की परंपरा सदियों से मनुष्य की साधना और जिज्ञासा से विकसित हुई है। आधुनिक युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता इस ज्ञान को संरक्षित करने और नए आयाम देने का माध्यम बन सकती है, किंतु इसके प्रयोग में संतुलन और विवेक अनिवार्य है। मुख्य वक्ता के रूप में बीकानेर तकनीकी विश्वविद्यालय के कुलपति अखिल रंजन गर्ग ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता निरंतर विकसित हो रही है और भारतीय भाषाओं के लिए विशिष्ट एआई भाषा मॉडल तैयार करना समय की आवश्यकता बन गया है। उन्होंने पाण्डुलिपियों के डिजिटलीकरण को ज्ञान-संरक्षण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया बताया।
भारतीय भाषाओं के डिजिटाइजेशन पर जोर
भाषिणी परियोजना के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ नाग ने भारतीय भाषाओं के डिजिटाइजेशन की आवश्यकता और उसके व्यापक प्रभावों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि भाषिणी के माध्यम से देश की 22 से अधिक भाषाओं के डिजिटल रूपांतरण और तकनीकी विकास पर कार्य किया जा रहा है, जिससे ज्ञान का दायरा अधिक व्यापक हो सकेगा। अजय कुमार राजावत ने अपने प्रस्तुतीकरण में भाषाई ट्रांसक्राइबिंग की तकनीक का प्रदर्शन किया, जबकि आईआईटी जोधपुर के प्रोफेसर गौरव हरित ने चित्रों और दृश्य सामग्री के विश्लेषण में एआई आधारित तकनीकों की उपयोगिता समझाई।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र, दिल्ली से जुड़े पवन कुमार ने मानव-कृत्रिम बुद्धिमत्ता लूप मॉडल की अवधारणा पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भविष्य का शोध कार्य मनुष्य की बौद्धिक क्षमता और मशीन की विश्लेषणात्मक शक्ति के संयुक्त प्रयास से अधिक सटीक और प्रभावी बन सकता है।
सांस्कृतिक विरासत और चिकित्सा ग्रंथों में नई संभावनाएँ
आयुष मंत्रालय से जुड़े सुमित ने भारतीय चिकित्सा ग्रंथों के अध्ययन में एआई के उपयोग की संभावनाओं को रेखांकित किया। वहीं संदेशा रायपाल ने सांस्कृतिक क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संभावित दुरुपयोग की आशंकाओं पर भी ध्यान आकर्षित किया दिल्ली विश्वविद्यालय के परीक्षित सिरोही ने एआई आधारित कॉपीराइट संरक्षण और डीप सर्च तकनीक पर अपने विचार रखे। रूस की शोधकर्ता इना और नाजिया मेसेलोवा ने रूसी भाषा में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए भाषाई अनुसंधान में एआई के उपयोग के नए आयामों पर चर्चा की।
डिजिटाइजेशन और ओसीआर तकनीक पर प्रस्तुति
कृत्रिम बुद्धिमत्ता उद्योग से जुड़े विशेषज्ञ अमित चावला, सतनाम सिंह और सौरभ शेट्टी ने पाण्डुलिपियों और प्रकाशित दस्तावेजों के डिजिटाइजेशन, स्कैनिंग तथा ओसीआर तकनीक की सटीकता में एआई की भूमिका को विस्तार से समझाया। उन्होंने जेनरेटिव एआई और सेमांटिक एआई के माध्यम से प्राचीन लेखन सामग्री को पढ़ने और समझने की नई संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला। कार्यक्रम के अंत में नितिन गोयल ने आगंतुकों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि एआई आधारित भाषा परियोजनाओं में स्थानीय विद्यार्थियों के लिए भाषा विशेषज्ञ के रूप में रोजगार के अवसर विकसित हो सकते हैं। इससे न केवल भाषाओं के संरक्षण को बल मिलेगा, बल्कि युवाओं के लिए तकनीक आधारित नए अवसर भी सृजित होंगे।
सम्मेलन में दिग्विजय सिंह, नारायण चोपड़ा, विमल गहलोत, राजेन्द्र कुमार, राकेश शर्मा और चन्द्रशेखर कच्छावा सहित अनेक लोग उपस्थित रहे। संचालन गोपाल जोशी ने किया। सम्मेलन के दूसरे दिन विभिन्न तकनीकी सत्र आयोजित किए जाएंगे, जिनमें आईआईटी रुड़की के स्पर्श मित्तल और आईआईटी मंडी के रोहित सलुजा अपने व्याख्यान प्रस्तुत करेंगे।



