बीबीएन, बीकानेर। बीकानेर की शांत दोपहर में शब्दों और स्मृतियों का एक विरल संगम साकार हुआ, जब वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. नंदकिशोर आचार्य ने संस्मरण विधा की अंतर्धारा को इतिहास की धड़कनों से जोड़ते हुए कहा कि संस्मरण केवल स्मृति की कोमल फुसफुसाहट नहीं, समय के मस्तक पर अंकित वह लिपि है, जिसमें व्यक्ति और घटना अपने संपूर्ण सत्य के साथ उपस्थित होते हैं।
अकादमी सभागार में स्व. शिवराज छंगाणी के राजस्थानी संस्मरण-संग्रह ‘ओळूं रै ओळावै’ के लोकार्पण अवसर पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि संस्मरण वही है जिसमें व्यक्ति का तेज भी चमके और उसकी दुर्बलता का छाया-पक्ष भी; क्योंकि स्मृति का विधान तभी पूर्ण होता है जब वह मनुष्य को उसके समूचे रूप में दर्ज करे।
डॉ. आचार्य ने कहा कि छंगाणी का व्यक्तित्व लोकजीवन की मिट्टी में इस तरह रचा-बसा था कि उनके संस्मरण पढ़ते हुए लगता है मानो राजस्थान की धूल, हवाएँ और लोक-स्वर स्वयं अपनी कथा सुना रहे हों। उन्होंने छंगाणी से जुड़े अनेक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि स्मृतियाँ कभी-कभी व्यक्ति से बड़ी हो जाती हैं और वे ही भविष्य के इतिहास-लेखन का मौन आधार बनती हैं।
सभागार में उपस्थित साहित्यकारों और सरोकारी व्यक्तियों की उपस्थिति से वातावरण शब्दों के प्रति श्रद्धा और स्मृति के प्रति विनम्रता से भर उठा—
एन. डी. रंगा, इन्द्र छंगाणी, डॉ. बसन्ती हर्ष, मुकेश व्यास, डॉ. गौरीशंकर प्रजापत, योगेन्द्र कुमार पुरोहित, सरोज भाटी, और अन्य अनेक, जिनकी उपस्थिति स्वयं इस बात का प्रमाण थी कि स्मृतियाँ केवल व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक विरासत भी होती हैं।
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