बीबीएन, नेटवर्क । राजस्थान हाईकोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने और मामलों के अनावश्यक लंबित रहने पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हाईकोर्ट द्वारा जारी नए स्टैंडिंग ऑर्डर के अनुसार अब प्रत्येक मामले में हुई स्थगन (Adjournment) की संख्या कॉज लिस्ट में अलग से प्रदर्शित की जाएगी। इसके साथ ही यह भी दर्ज किया जाएगा कि स्थगन की मांग याचिकाकर्ता, अपीलकर्ता, आवेदक, प्रतिवादी अथवा अन्य किसी कारण से हुई थी। यह पूरी प्रक्रिया विशेष रूप से विकसित सॉफ्टवेयर और डिजिटल एप्लिकेशन के माध्यम से संचालित होगी। अदालत का मानना है कि इससे मामलों में देरी के वास्तविक कारणों की पहचान आसान होगी और न्यायिक प्रक्रिया अधिक जवाबदेह तथा पारदर्शी बनेगी।
राजस्थान हाईकोर्ट, जोधपुर द्वारा जारी स्टैंडिंग ऑर्डर संख्या 06/S.O./2026 में बताया गया है कि यह व्यवस्था 14 मई 2026 को पारित एक न्यायिक आदेश की अनुपालना में लागू की जा रही है। आदेश के अनुसार अब से प्रत्येक मामले में स्थगन का पूरा रिकॉर्ड डिजिटल रूप से संधारित किया जाएगा और उसकी जानकारी सीधे कॉज लिस्ट में दिखाई देगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि जिन मामलों को सुनवाई के दौरान “नॉट रीच” श्रेणी में रखा जाता है, अर्थात जिन तक अदालत समयाभाव या अन्य प्रशासनिक कारणों से पहुंच नहीं पाती, उन्हें स्थगन की गणना में शामिल नहीं किया जाएगा।
इस आदेश के तहत न्यायिक शाखाओं के प्रभारी अधिकारियों, डीलिंग क्लर्कों, कॉज लिस्ट प्रभारी कर्मचारियों तथा न्यायाधीशों के निजी सहायकों को विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई है। पुराने मामलों में अब तक हुए स्थगनों का विवरण एक बार विशेष अभियान चलाकर सॉफ्टवेयर में दर्ज किया जाएगा। इसके बाद प्रत्येक नई सुनवाई के साथ स्थगन संबंधी जानकारी नियमित रूप से अपडेट की जाएगी। अदालत ने निर्देश दिए हैं कि किसी भी मामले को कॉज लिस्ट में शामिल करने से पहले उसमें स्थगन की संख्या दर्ज होना सुनिश्चित किया जाए, ताकि सूची जारी होने के समय सभी आंकड़े अद्यतन रहें।
यह आदेश ऐसे समय आया है जब देशभर में लंबित मामलों की संख्या न्यायपालिका के सामने एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि बार-बार स्थगन मिलने के कारण अनेक मामलों के निस्तारण में वर्षों लग जाते हैं। अब तक अधिकांश मामलों में यह जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं होती थी कि किसी मुकदमे में कितनी बार और किस पक्ष की ओर से तारीख ली गई। नई व्यवस्था लागू होने के बाद न्यायालय, वकील और पक्षकार सभी यह स्पष्ट रूप से देख सकेंगे कि मामले में देरी का कारण कौन रहा है। इससे अनावश्यक स्थगन मांगने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगने की संभावना है।
विधि विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि न्यायिक दक्षता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण सुधार माना जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में ई-कोर्ट, ऑनलाइन फाइलिंग, वर्चुअल सुनवाई और डिजिटल रिकॉर्ड प्रबंधन जैसी व्यवस्थाओं को लगातार बढ़ावा दिया गया है। अब स्थगनों की डिजिटल निगरानी को भी उसी सुधार प्रक्रिया का हिस्सा माना जा रहा है। इससे अदालतों को लंबित मामलों के विश्लेषण, कार्यभार प्रबंधन और सुनवाई की गति बढ़ाने में सहायता मिलेगी।




