ब्रजरतन जोशी.
आज हिंदी परिसर अवाक है।विनोद कुमार शुक्ल का जाना हिंदी साहित्य परिसर से उस दुर्लभ नैतिक स्वभाव का विदाई है, जो शोर, प्रचार और सत्ता की संगत से लगातार बचता रहा। उनके लिए लेखन यानी जीवन की स्वाभाविक श्वास प्रश्वास । इस अपनी तरह के विरल लेखक ने कभी भी साहित्य की राजनीति से अपने लिए कोई जगह नहीं माँगी, न विचारधाराओं की घेराबंदी को अपनी पहचान बनने दिया। वे बस लिखते रहे, चुपचाप लिखते रहे और निरंतर लिखते रहे और सबके लिए लिखते रहे। इस तरह उनका लेखन धीरे-धीरे वैश्विक संवेदना का प्रमाण बनता चला गया।
साहित्य परिवार में उनकी सबसे बड़ी उपस्थिति शायद यही थी कि वे अनुपस्थित रहकर भी उपस्थित थे। न गोष्ठियाँ, न मंच, न पुरस्कार-प्रबंधन, न सोशल मीडिया का शोर। अलग मुहावरा,अलग शैली और कहन की अलग किन्तु मर्म को छू जाने वाली आकृति।राजस्थानी के मुहावरे में कहूं, तो वे हिंदी साहित्य की फड़दी थे।
आज के समय में यह लगभग असंभव-सा लगता है कि कोई लेखक केवल अपनी भाषा और शब्दों के भरोसे, बिना किसी प्रचार तंत्र के, इतने गहरे और स्थायी ढंग से पाठक के भीतर अपनी जगह बना ले। विनोद कुमार शुक्ल इस असंभव संभावना को सहज साकार करने में कामयाब रहे रचनाकार थे। उनके पास कोई ट्रॉल सेना नहीं थी जो उन्हें ऊपर चढ़ाए या नीचे गिराए। तमाम तरह की उठापटक से बाहर,अपने साधारण से किंतु शांत कमरे में बैठे, मनुष्य, प्रकृति और जीवन की महीन रेखाओं को देख रहे थे।
उनकी कविता और गद्य में जो करुणा है, वह न तो भावुकता है और न ही दया का प्रदर्शन। वह करुणा है जो चीज़ों को उनके पूरे अस्तित्व के साथ स्वीकार करती है। एक साधारण घर, एक पेड़, एक आदमी का अकेलापन, एक स्त्री की चुप्पी, एक बच्चे की दृष्टि सब कुछ उनके यहां इतना स्पष्ट, इतना पारदर्शी हो जाता है कि मानो पाठक अपने जाने पहचाने संसार को किसी नवीन दुनिया की तरह देख रहा हो। यह देखने दिखाने की कला बहुत कम लेखकों के पास होती है। और यह कला किसी विचारधारा से नहीं, बल्कि गहरे मानवीय अनुशासन से आती है।
उनका जीवन स्वयं एक मौन प्रतिरोध था। उस समय के विरुद्ध जब लेखक को लगातार दिखते रहना होता है, बोलते रहना होता है, प्रतिक्रिया देते रहना होता है। विनोद कुमार शुक्ल ने न दिखकर, न बोलकर, केवल लिखकर यह बताया कि साहित्य की सबसे बड़ी ताकत उसकी चुप्पी भी हो सकती है। प्रशासनिक दबावों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और साहित्यिक अवसरवाद से दूरी बनाकर उन्होंने अपने लेखन को सुरक्षित रखा। यही कारण है कि उनका लेखन समय के साथ और प्रासंगिक होता गया , कभी पुराना नहीं पड़ा। उनके न रहने पर जो शून्य बनता है,उसे किसी पद या संस्था से नहीं भरा जा सकता। वह शून्य उस भरोसे का है कि साहित्य अभी भी बिना शोर के जिया जा सकता है। उनका जाना हमें यह याद दिलाता है कि सच्चा लेखक वही है जो अपने समय की आवाज़ बनने के लिए समय से सौदेबाज़ी न करे बल्कि संगत करे । विनोद कुमार शुक्ल का जाना एक गहरी, शांत उदासी है—ऐसी उदासी जो रोती नहीं, बस देर तक बैठी रहती है, और हमें भीतर से थोड़ा और मानवीय बना जाती है।
प्रिय लेखक को विदा प्रणाम।


