बीबीएन, नेटवर्क, 21 अगस्त। साथी कांस्टेबल की पत्नी से छेड़छाड़ और अनुशासनहीन आचरण के दोषी पाए जाने पर सेवा से बर्खास्त बीएसएफ के जवान की याचिका खारिज कर दी है।
दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सी. हरि शंकर और न्यायमूर्ति अजय दिगपौल की खंडपीठ ने कहा कि जब तक कोई चिकित्सकीय राय आरोपी को मुकदमे का सामना करने के अयोग्य घोषित न करे, तब तक अनुशासनात्मक कार्रवाई निरस्त नहीं की जा सकती। अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह का अपराध “बल की एकजुटता और पारस्परिक विश्वास की नींव को ही हिला देता है।”
पीठ ने कहा, “जिस घटना में याचिकाकर्ता दोषी पाया गया, अर्थात साथी कांस्टेबल की पत्नी की अस्मिता भंग करना, उसका गंभीर असर बल की ईमानदारी, अनुशासन और आपसी विश्वास पर पड़ता है। यदि ऐसे कृत्य को कठोरतम अनुशासनात्मक कार्रवाई से न रोका जाए तो यह गलत संदेश देगा और संगठन की साख पर सवाल खड़ा करेगा।”
मामले के अनुसार, कांस्टेबल को छह सप्ताह के लिए ‘लो मेडिकल कैटेगरी’ में रखा गया था। इसी दौरान साथी जवान ने लिखित शिकायत दी कि गश्ती ड्यूटी के दौरान उसकी अनुपस्थिति में आरोपी उसके घर घुसा, उसकी पत्नी से दुर्व्यवहार किया और कुछ रकम ले गया। जांच के बाद उस पर औपचारिक चार्जशीट दायर हुई।
कार्यवाही से पहले उसे चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया और फिट घोषित किया गया। सारांश सुरक्षा बल न्यायालय ने धारा 354 (महिला की अस्मिता भंग) के तहत दोषी ठहराया, जबकि धारा 380 (गृह-भेदन कर चोरी) से बरी कर दिया। हालांकि सजा के रूप में सेवा से बर्खास्तगी बरकरार रखी गई।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि वह मानसिक बीमारी से जूझ रहा था, फिर भी सामान्य चिकित्सक की राय पर मुकदमा चलाया गया। किंतु अदालत ने पाया कि उसे बीएसएफ और सिविल अस्पतालों दोनों में इलाज मिला था और उस समय उसे मुकदमे का सामना करने में असमर्थ बताने वाली कोई चिकित्सकीय राय उपलब्ध नहीं थी। अदालत ने यह भी कहा कि आरोपी ने गवाही सुनी, गवाहों से जिरह की और अपने बचाव में साक्ष्य भी प्रस्तुत किए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि वह मुकदमे की प्रकृति समझने और अपनी ओर से जवाब देने में सक्षम था। इस आधार पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी और बर्खास्तगी को उचित ठहराया।
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