बीबीएन, नेटवर्क। रूस में निर्मित अत्याधुनिक S-400 ट्रायम्फ एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम का चौथा स्क्वाड्रन रूसी क्षेत्र से भारत के लिए रवाना हो चुका है। सैन्य सूत्रों के मुताबिक इसे राजस्थान ओर गुजरात की पश्चिमी सरहद पर तैनात किया जाएगा। वायु सेना में ‘सुदर्शन चक्र’ के नाम से विख्यात इस रक्षा प्रणाली का भारत को लंबे समय से इंतजार था। मई 2025 में भारत-पाकिस्तान सैन्य झड़प के दौरान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में इस प्रणाली ने बेहद प्रभावी भूमिका निभाई थी, जिसके बाद यह रणनीतिक हथियार से बढ़कर एक युद्ध-परीक्षित ऑपरेशनल प्लेटफॉर्म बन चुका है। भारत सरकार ने इस प्रणाली के बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए पांच अतिरिक्त स्क्वाड्रन और लगभग 280 इंटरसेप्टर मिसाइलें खरीदने का भी निर्णय लिया है, जिससे भविष्य में कुल इन्वेंट्री बढ़कर 10 स्क्वाड्रन हो जाएगी।
भारत ने अक्टूबर 2018 में रूस के साथ सरकारी स्तर पर S-400 प्रणाली के लिए एक ऐतिहासिक समझौता किया था। लगभग 40,000 करोड़ रुपये ($5.43 बिलियन) लागत वाले इस मूल अनुबंध के तहत कुल पांच स्क्वाड्रनों की आपूर्ति शामिल थी। इनमें से तीन स्क्वाड्रन पहले ही भारतीय रक्षा नेटवर्क में एकीकृत होकर रणनीतिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात किए जा चुके हैं। चौथे स्क्वाड्रन की आपूर्ति इस साल के अंत तक या लॉजिस्टिक्स की समय-सीमाओं के कारण वर्ष 2027 की शुरुआत तक पूरी होने की संभावना जताई जा रही थी, लेकिन अब यह इसी महीने भारतीय तट पर पहुंच रहा है।
यह अत्याधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम भारतीय वायु सेना को दुश्मन के विमानों, ड्रोन, बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों को भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने से पहले ही नष्ट करने की क्षमता प्रदान करता है। यह सिस्टम संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में एक ऐसा ‘एंटी-एक्सेस’ और ‘एरिया डिनायल’ जोन तैयार करता है जहां दुश्मन की वायु सेना के लिए उड़ान भरना असंभव हो जाता है। इस प्रणाली से जुड़ी सबसे लंबी दूरी की इंटरसेप्टर मिसाइल ’40N6E’ 400 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद किसी भी हवाई खतरे को सटीक निशाना बनाने में सक्षम है। S-400 कोई एकल उपकरण नहीं है, बल्कि प्रत्येक स्क्वाड्रन में लॉन्चर व्हीकल, शक्तिशाली एंगेजमेंट रडार, कमांड-एंड-कंट्रोल यूनिट, मिसाइल कैरियर और तकनीकी सपोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल होते हैं।
भारतीय रक्षा विश्लेषकों के अनुसार S-400 की मौजूदा तैनाती को सामरिक रूप से अत्यंत संवेदनशील भौगोलिक बिंदुओं पर केंद्रित किया गया है ताकि देश को अधिकतम कवरेज मिल सके। इसकी एक तैनाती सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास है, जिसे आम तौर पर ‘चिकन नेक’ कहा जाता है। यह जमीन का एक संकरा हिस्सा है जो भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों को देश के बाकी हिस्सों से जोड़ता है। इस इलाके को भारत के सबसे ज्यादा रणनीतिक रूप से संवेदनशील भौगोलिक बिंदुओं में से एक माना जाता है, क्योंकि यहां किसी भी तरह की रुकावट उत्तर-पूर्व को देश के बाकी हिस्सों से अलग कर सकती है। इसके अतिरिक्त एक और स्क्वाड्रन पठानकोट में तैनात किया गया है, जिससे जम्मू-कश्मीर और पंजाब के कुछ हिस्सों में मजबूत हवाई कवरेज मिलता है।
इस हफ्ते आने वाले चौथे स्क्वाड्रन से भी भारत के पश्चिमी क्षेत्र को मजबूत करने की उम्मीद है, जो राजस्थान और गुजरात को कवर करने वाले क्षेत्रों की सुरक्षा को अभेद्य बनाएगा। सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि S-400 की रडार रेंज और एंगेजमेंट एनवेलप दुश्मन की वायु सेनाओं के लिए गंभीर ऑपरेशनल मुश्किलें पैदा करते हैं, क्योंकि उनके कीमती विमानों को भारतीय हवाई क्षेत्र से काफी दूर रहकर ही काम करना पड़ता है। रूस से भारत तक इस स्क्वाड्रन का मूवमेंट एक बड़ी लॉजिस्टिक एक्सरसाइज है, क्योंकि इन पार्ट्स को पहले रूसी फैसिलिटी से खास कार्गो वेसल के जरिए ट्रांसपोर्ट किया जाता है। ये शिपमेंट भारतीय पोर्ट पर जाते हैं, जहां भारी सुरक्षा अरेंजमेंट के तहत अनलोडिंग ऑपरेशन को कोऑर्डिनेट किया जाता है और वहां से रेलवे नेटवर्क व हेवी-ड्यूटी रोड काफिले के जरिए इंडियन एयर फोर्स की तय डिप्लॉयमेंट लोकेशन पर ट्रांसफर किया जाता है।




