बीबीएन, बीकानेर । मोबाइल फोन की लत में फंसते बच्चों, घटती एकाग्रता और बिगड़ते सामाजिक व्यवहार ने आखिरकार राजस्थान शिक्षा विभाग को कड़ा रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया है। विभाग ने राज्य के सभी स्कूलों के लिए सख्त दिशा-निर्देश जारी करते हुए साफ कर दिया है कि शिक्षा के मंदिर अब मोबाइल संस्कृति के अड्डे नहीं बनने दिए जाएंगे। आदेशों में विद्यार्थियों के मोबाइल उपयोग पर नियंत्रण, साइबर अपराधों से बचाव और डिजिटल अनुशासन लागू करने पर विशेष जोर दिया गया है।
शिक्षा विभाग ने माना है कि मोबाइल और सोशल मीडिया का अंधाधुंध इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई ही नहीं, बल्कि उनके मानसिक संतुलन और सामाजिक व्यवहार को भी निगल रहा है। यही कारण है कि स्कूलों को निर्देश दिए गए हैं कि विद्यार्थी मोबाइल को मनोरंजन और गेमिंग का हथियार नहीं, बल्कि केवल पढ़ाई और ज्ञान के साधन के रूप में इस्तेमाल करें। विभाग ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि बढ़ता स्क्रीन टाइम बच्चों की दिनचर्या, स्वास्थ्य और भविष्य—तीनों पर भारी पड़ रहा है।
नए आदेशों के मुताबिक अब स्कूल परिसर में विद्यार्थियों द्वारा मोबाइल फोन का उपयोग पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा। यदि कोई छात्र मोबाइल लेकर आता है तो स्कूल प्रशासन उसे जब्त कर अभिभावकों को सूचना देगा। साथ ही संबंधित विद्यार्थी को भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने की चेतावनी भी दी जाएगी। विभाग ने साइबर अपराध और ऑनलाइन ठगी को लेकर भी चिंता जताई है। विद्यार्थियों को सोशल मीडिया पर बिना जांच-पड़ताल किसी भी सूचना को साझा न करने और निजी जानकारी इंटरनेट पर डालने से बचने की सलाह दी गई है। साइबर बुलिंग की घटनाओं को गंभीर खतरा मानते हुए स्कूलों को जागरूकता कार्यक्रम चलाने के निर्देश दिए गए हैं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए शिक्षा विभाग ने विद्यार्थियों को एआई तकनीक से परिचित कराने की बात कही है, लेकिन साथ ही चेताया है कि एआई से मिलने वाली हर जानकारी को आंख मूंदकर सच मानना खतरनाक हो सकता है। विभाग ने कहा कि तकनीक का इस्तेमाल विवेक से हो, वरना यही साधन विद्यार्थियों की सोचने-समझने की क्षमता को कमजोर कर सकता है।
स्कूलों में “नो-बैग डे” आयोजित कर बच्चों को मोबाइल के दुष्प्रभाव, शारीरिक गतिविधियों और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूक किया जाएगा। शिक्षकों को यह जिम्मेदारी भी सौंपी गई है कि वे विद्यार्थियों के व्यवहार में अचानक आने वाले बदलावों पर नजर रखें। यदि कोई बच्चा अकेलापन महसूस कर रहा हो, पढ़ाई से दूरी बना रहा हो या चिड़चिड़ा हो रहा हो तो तत्काल अभिभावकों से संपर्क किया जाए। अभिभावकों को भी विभाग ने कठघरे में खड़ा करते हुए कहा है कि वे बच्चों के हाथों में बिना जरूरत महंगे गैजेट्स थमाने से पहले गंभीरता से सोचें। माता-पिता को बच्चों के मोबाइल उपयोग पर निगरानी रखने, पैरेंटल कंट्रोल सक्रिय करने और डिजिटल गतिविधियों पर नजर बनाए रखने की सलाह दी गई है।
शिक्षा विभाग का साफ संदेश है कि यदि समय रहते मोबाइल की बढ़ती लत पर लगाम नहीं लगी तो आने वाली पीढ़ी किताबों से नहीं, केवल स्क्रीन से संचालित होगी। ऐसे में स्कूल, शिक्षक और अभिभावक तीनों को मिलकर डिजिटल अनुशासन की इस लड़ाई को गंभीरता से लड़ना होगा।




