बीबीएन,बीकानेर । शुष्क बागवानी की नई राह तलाश रहे राजस्थान के किसानों के लिए मिट्टी, पानी और उर्वरक का सही तालमेल अब मुश्किल नहीं रहेगा। आईसीएआर-केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान (सीआइएच) ने तेजरासर व हिमतासर गाँवों में ‘खेत बचाओ अभियान’ के तहत किसानों को जैविक खेती, मृदा परीक्षण, बागवानी फसलों की उन्नत किस्मों और कम लागत में अधिक उत्पादन के गुर सिखाए। इस दौरान वैज्ञानिकों ने सरकारी योजनाओं को खेत तक पहुँचाने की रणनीति भी समझाई, ताकि किसान न सिर्फ उपज बढ़ाएँ, बल्कि जमीन की सेहत भी बचाए रखें।
संस्थान के निदेशक डॉ. जगदीश राणे ने किसानों को संबोधित करते हुए बताया कि रासायनिक उर्वरकों की अंधाधुंध खपत से जहाँ एक ओर उत्पादन लागत बढ़ती है, वहीं दूसरी ओर मिट्टी की क्षमता घटती जाती है। उन्होंने जैविक खाद और हरी खाद जैसे पारंपरिक साधनों को आधुनिक बागवानी से जोड़ने पर बल दिया। वहीं डॉ. धुरेन्द्र सिंह ने जैव-उर्वरकों की भूमिका को रेखांकित करते हुए किसानों को सलाह दी कि वे नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश के साथ-साथ सूक्ष्म पोषक तत्वों पर भी ध्यान दें।
इस अवसर पर डॉ. डी.के. समादिया ने स्थानीय सब्जियों — काचरी, काकड़िया, ग्वारफली, तरककड़ी, पालक और खेजरी — की वैज्ञानिक खेती की बारीकियाँ समझाईं। उन्होंने जोर देकर कहा कि इन फसलों में उन्नत किस्मों का चुनाव और सही पोषण व्यवस्था ही सफलता की कुंजी है।
डॉ. रमेश कुमार ने अनार, बीलपत्र और नींबू-वर्गीय पौधों पर जैविक तरीकों से मृदा-स्वास्थ्य सुधारने के उपाय बताए। डॉ. एस. आर. मीना ने इस पूरे अभियान को देशव्यापी जागरूकता का हिस्सा बताते हुए कहा कि किसानों की भागीदारी इसे सार्थक बनाती है।
गौरतलब है कि इस कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने किसानों से रूबरू होकर उनकी समस्याएँ सुनीं और खेत-खलिहान में जाकर मिट्टी के नमूनों के परीक्षण की सलाह भी दी। किसानों को बताया गया कि सरकार की ओर से मिलने वाली योजनाओं का लाभ कैसे उठाया जाए और कम पानी वाले इलाके में कौन-सी फसलें अधिक फायदेमंद हो सकती हैं। इस दौरान किसानों ने बागवानी को व्यवसाय के रूप में अपनाने के प्रति भी उत्साह दिखाया।
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