बीबीएन, नेटवर्क। भारत की हाइपरसोनिक मिसाइल क्षमता अब निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है। ड्रैगन और वैश्विक रक्षा शक्तियों की तेज रफ्तार होड़ के बीच भारत ने 2027-28 के लिए ब्रह्मोस-II का पहला फ्लाइट टेस्ट निर्धारित कर दिया है। यह परीक्षण न केवल देश की सामरिक रणनीति को नई दिशा देगा, बल्कि भारत को दुनिया के चुनिंदा देशों की उस सूची में पहुंचाएगा, जो भरोसेमंद हाइपरसोनिक स्ट्राइक सिस्टम विकसित करने की क्षमता रखते हैं। पहले परीक्षण का प्राथमिक उद्देश्य तीन अत्याधुनिक तकनीकों को प्रमाणित करना है Mach 8 गति, हाइपरसोनिक गाइडेंस, और अल्ट्रा-हाई टेम्परेचर मटीरियल।
✔ Mach 8 स्पीड: स्क्रैमजेट इंजन की सबसे कठिन परीक्षा
पहले चरण का सबसे बड़ा लक्ष्य मिसाइल को Mach 8 की स्पीड पर स्थिर उड़ान देने का है। इतनी तेज रफ्तार पर केवल अत्यधिक कुशल स्क्रैमजेट इंजन ही काम कर सकते हैं। DRDO वैज्ञानिक इसी तकनीक को अंतिम रूप देने में जुटे हैं, जिससे भारत के हाइपरसोनिक इंजन विकास की क्षमता का प्रदर्शन होगा।
✔ नई पीढ़ी का एल्गोरिदमिक नियंत्रण
Mach 8 पर मिसाइल के चारों ओर बनने वाली शॉक लेयर पारंपरिक सेंसरों को प्रभावित करती है। ऐसे में ब्रह्मोस-II को नियंत्रित करने के लिए उन्नत एल्गोरिदम, हाई-स्पीड नेविगेशन और विशेष सीकर सिस्टम तैयार किए जा रहे हैं। इस तकनीक के सफल होने पर भारत की मिसाइल किसी भी आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम को भेदने में सक्षम हो जाएगी।
✔ 2000°C से अधिक तापमान को सहने वाला मटीरियल
हाइपरसोनिक उड़ान के दौरान मिसाइल का तापमान 2000°C से ज्यादा हो जाता है। इसे झेलने के लिए भारत अल्ट्रा-हाई टेम्परेचर सिरेमिक्स, नए कॉम्पोजिट स्ट्रक्चर और उन्नत हीट-रेजिस्टेंट कोटिंग्स पर काम कर रहा है। DRDO और रूस के साथ संयुक्त अनुसंधान इस विकास को मजबूत आधार दे रहे हैं।
✔ 2030 तक मल्टी-लेयर हाइपरसोनिक स्ट्राइक क्षमता का लक्ष्य
भारत की दीर्घकालिक रणनीति के अनुसार 2030 के शुरुआती दशक तक एक मल्टी-लेयर हाइपरसोनिक स्ट्राइक सिस्टम तैयार करना है, जिसमें मैक 8 स्पीड, प्रिसिजन गाइडेंस और एडवांस्ड प्रोपल्शन प्रमुख भूमिका निभाएँगे। अमेरिका, चीन और रूस पहले ही इस रेस में आगे हैं, इसलिए भारत के लिए यह तकनीक सामरिक दृष्टि से अत्यंत निर्णायक मानी जा रही है।
✔ हाइपरसोनिक इकोसिस्टम की ओर बड़ा कदम
ब्रह्मोस-II का सफल परीक्षण केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं होगा, बल्कि यह प्रमाण होगा कि भारत अब स्वदेशी हाइपरसोनिक इकोसिस्टम विकसित कर चुका है। आने वाले महीनों में स्क्रैमजेट इंजन की फाइनल ट्यूनिंग, नए सीकर की स्थापना और संरचनात्मक परीक्षण किए जाएंगे, ताकि मिसाइल पहली उड़ान के लिए पूरी तरह तैयार हो सके।
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