बीबीएन, नेटवर्क। सूबे से सामने आई एक घटना ने आधुनिक भारत और समाज की जड़ मानसिकता के बीच गहरी खाई को फिर उजागर कर दिया है। एक गांव में शादी समारोह के दौरान एक दुल्हन को कथित तौर पर केवल इसलिए घोड़ी से उतार दिया गया, क्योंकि कुछ लोगों को उसका घोड़ी पर बैठना नागवार गुजरा। आरोप है कि विरोध करने पर दुल्हन के परिजनों के साथ मारपीट भी की गई। मामला उदयपुर के डबोक थाना क्षेत्र के हरियाव गांव का है। इस घटना ने पूरे इलाके में आक्रोश फैला दिया है और अब यह मामला सामाजिक सम्मान, बराबरी और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी बड़ी बहस बन चुका है।
जानकारी के अनुसार 29 अप्रैल को पूजा मेघवाल की शादी के दौरान बिंदोली निकाली जा रही थी। दुल्हन घोड़ी पर सवार थी, तभी कुछ स्थानीय लोगों ने कथित तौर पर इसका विरोध शुरू कर दिया। आरोप है कि दबाव बनाकर दुल्हन को घोड़ी से नीचे उतरने के लिए मजबूर किया गया। इतना ही नहीं, विरोध करने पर परिवार के लोगों के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट भी की गई। यह घटना केवल एक शादी समारोह में हुए विवाद तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने समाज में अब भी मौजूद जातीय अहंकार और संकीर्ण सोच पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस देश में महिला सशक्तिकरण और सामाजिक समानता की बातें की जाती हैं, वहां एक दुल्हन का घोड़ी पर बैठना कुछ लोगों को बर्दाश्त नहीं हुआ।
पीड़िता पूजा मेघवाल ने मीडिया से बातचीत में कहा कि घटना ने उन्हें भीतर तक अपमानित कर दिया। उनका कहना है कि सार्वजनिक रूप से उन्हें घोड़ी से उतरने के लिए मजबूर किया गया और परिवार के साथ अभद्र व्यवहार किया गया। घटना के बाद सोशल मीडिया पर भी लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और कई लोगों ने इसे सामाजिक भेदभाव की मानसिकता का शर्मनाक उदाहरण बताया।
घटना के विरोध में बहुजन समाज पार्टी और विभिन्न दलित संगठनों ने मोर्चा खोल दिया। बड़ी संख्या में लोग नगर पालिका परिसर में जुटे और वहां से कलेक्ट्रेट तक प्रदर्शन मार्च निकाला। इस दौरान पूजा मेघवाल स्वयं घोड़ी पर सवार होकर कलेक्ट्रेट पहुंचीं। प्रदर्शनकारियों ने प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपते हुए निष्पक्ष जांच तथा कठोर कार्रवाई की मांग की।
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि घटना में कई लोग शामिल थे, लेकिन अब तक केवल कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है। इसे लेकर पुलिस की कार्रवाई और जांच की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। संगठनों ने मांग की है कि मामले की जांच किसी स्वतंत्र अधिकारी से कराई जाए, ताकि पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके। यह घटना केवल उदयपुर की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की तस्वीर बनकर सामने आई है, जो आज भी बराबरी के अधिकारों को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिखती। सवाल यह है कि आखिर समाज कब तक जाति और ऊंच-नीच की दीवारों में कैद रहेगा।



