बीबीएन, नेटवर्क | भारत समेत दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का दायरा तेजी से फैल रहा है और अब इसका असर जेल सुरक्षा व्यवस्था पर भी दिखने लगा है। कर्नाटक में जेलों की निगरानी को मजबूत बनाने के लिए एआई आधारित सिस्टम की टेस्टिंग शुरू कर दी गई है। इस तकनीक से राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल जल्द ही लैस होगी। इस नई तकनीक के जरिए कैमरे सिर्फ रिकॉर्डिंग नहीं करेंगे, बल्कि संदिग्ध गतिविधियों को पहचानकर तुरंत अलर्ट भेजेंगे। इसका उद्देश्य जेलों में अवैध गतिविधियों, झगड़ों, तस्करी और सुरक्षा चूक पर तत्काल नियंत्रण करना है। इसे ऐसे डिजिटल गार्ड के रूप में देखा जा रहा है, जो बिना थके हर पल निगरानी करता रहेगा।
सामान्य CCTV से कैसे अलग है एआई निगरानी
पारंपरिक सीसीटीवी कैमरे केवल फुटेज रिकॉर्ड करते हैं, जिन्हें देखने के लिए मानव निगरानी जरूरी होती है। लंबे समय तक स्क्रीन पर नजर बनाए रखना मुश्किल होता है और कई बार अहम घटनाएं छूट जाती हैं। इसके विपरीत, एआई आधारित सिस्टम लगातार वीडियो का विश्लेषण करता है। कोई कैदी तय सीमा से बाहर जाता है, असामान्य हरकत करता है या प्रतिबंधित वस्तु नजर आती है, तो सिस्टम खुद ही चेतावनी जारी कर देता है। इससे जेल कर्मियों पर निगरानी का बोझ कम होता है और प्रतिक्रिया समय तेज होता है।
वैश्विक स्तर पर एआई का प्रयोग
अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों में जेलों और सार्वजनिक स्थलों पर एआई निगरानी पहले से लागू है। कई जगह यह तकनीक हथियार पहचानने, भीड़ के व्यवहार का आकलन करने और संभावित हिंसा की पहले से चेतावनी देने में सक्षम है। चीन में बड़े स्तर पर चेहरे और व्यवहार पहचानने वाले सिस्टम लगाए गए हैं, हालांकि वहां निजता को लेकर बहस भी जारी है। भारत में भी कुछ प्रमुख जेलों में इस दिशा में योजनाएं बन रही हैं।
जेलों को मिलने वाले प्रमुख लाभ
एआई तकनीक से भागने की कोशिश, आपसी झगड़े, दंगों की साजिश और मोबाइल या नशीले पदार्थों की तस्करी जैसी गतिविधियों पर तुरंत रोक लगाई जा सकेगी। कर्मचारियों की कमी से जूझ रही जेलों को अतिरिक्त सुरक्षा कवच मिलेगा और कैदियों के साथ-साथ स्टाफ की सुरक्षा भी बेहतर होगी।
चुनौतियां और सावधानियां
इस सिस्टम को लागू करने में कई चुनौतियां भी हैं। एआई को सटीक बनाने के लिए बड़े डेटा की जरूरत होती है। जेलों में होने वाली सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियों को गलत तरीके से खतरा न समझा जाए, इसके लिए सिस्टम को सावधानी से प्रशिक्षित करना होगा। लागत और रखरखाव भी बड़ा मुद्दा है। साथ ही, तकनीक के दुरुपयोग और निजता से जुड़े सवालों पर स्पष्ट नीति बनाना जरूरी होगा।
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