बीबीएन, बीकानेर। सूबे के सरकारी और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के नामों को लेकर शिक्षा विभाग एक नया अभियान शुरू करने जा रहा है। ‘सार्थक नाम अभियान’ के तहत ऐसे छात्रों के नाम बदले जाएंगे, जिनके नाम कथित रूप से अर्थहीन या अनुपयुक्त माने जाते हैं। इस पहल का उद्देश्य बच्चों में भविष्य में उत्पन्न होने वाली हीन भावना को रोकना बताया गया है। इसके लिए शिक्षा विभाग ने हजारों नामों की सूची तैयार की है, जिनमें से अभिभावक अपने बच्चों के लिए नए नाम चुन सकेंगे। हालांकि, इस निर्णय को लेकर सामाजिक संगठनों और अभिभावक संघों ने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े किए हैं।
क्या है ‘सार्थक नाम अभियान’
शिक्षा विभाग के अनुसार, कई बार अभिभावक अनजाने में या परंपरागत कारणों से बच्चों के ऐसे नाम रख देते हैं, जो आगे चलकर उपहास या असहजता का कारण बन सकते हैं। ऐसे मामलों में स्कूल प्रशासन अभिभावकों से संवाद कर बच्चों के लिए अधिक अर्थपूर्ण और सम्मानजनक नाम रखने का सुझाव देगा। इसके लिए विभाग ने लगभग 2 से 3 हजार नामों की सूची तैयार की है। इस सूची से नाम चुनकर छात्रों का नाम परिवर्तित किया जा सकेगा।
सम्मानजनक उपनामों पर भी जोर
अभियान के अंतर्गत केवल व्यक्तिगत नाम ही नहीं, बल्कि जातिगत उपनामों को भी अधिक सम्मानजनक रूप में बदलने पर बल दिया गया है। विभाग का मानना है कि सामाजिक सम्मान और समानता की भावना को बढ़ावा देने के लिए यह कदम आवश्यक है।
असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप
इस पहल पर संयुक्त अभिभावक संघ ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। संघ के अनुसार, राज्य में ऐसे मामलों की संख्या बेहद सीमित है, जबकि शिक्षा क्षेत्र में कई गंभीर समस्याएं बनी हुई हैं। अभिभावक संगठनों का कहना है कि निजी स्कूलों की बढ़ती फीस, पाठ्यपुस्तकों की अनियमित बिक्री और आरटीई के तहत चयनित छात्रों को प्रवेश न मिलने जैसे मुद्दे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं, जिन पर सरकार को ध्यान देना चाहिए।
सामाजिक संगठनों ने भी उठाए सवाल
सामाजिक संगठनों ने भी राज्य की शिक्षा व्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि विद्यालयों में आधारभूत सुविधाओं की कमी, अनुशासन संबंधी घटनाएं और अभिभावकों पर आर्थिक बोझ जैसे मुद्दे प्राथमिकता में होने चाहिए।
नीतिगत पहल या प्राथमिकता का प्रश्न?
‘सार्थक नाम अभियान’ को लेकर बहस तेज हो गई है। एक ओर सरकार इसे छात्रों के आत्मसम्मान से जोड़कर देख रही है, वहीं दूसरी ओर आलोचक इसे शिक्षा के मूलभूत मुद्दों से ध्यान हटाने वाला कदम बता रहे हैं। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि यह पहल जमीनी स्तर पर कितना प्रभावी साबित होती है।



