बीबीएन, बीकानेर | यह सिर्फ एक हादसा नहीं है, यह उस समाज की चुप्पी का परिणाम है, जहां चेतावनियां कागज़ों तक सीमित रहती हैं और ज़िंदगियां सड़कों पर कटती रहती हैं। देशनोक में एक 8 वर्षीय बालक की मौत ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि हमारी संवेदनाएं अब उतनी ही पतली हो चुकी हैं, जितना वह जानलेवा चाइनीज मांझा, जिसने एक मासूम की सांसों की डोर काट दी। वह बच्चा अपने माता-पिता के साथ मोटरसाइकिल पर बैठा था शायद उसने आसमान में उड़ती पतंगों को देखा होगा, शायद उसने भी उड़ान के सपने देखे होंगे। लेकिन उसे क्या पता था कि वही आसमान से उतरता एक अदृश्य धागा उसकी जिंदगी का अंतिम अध्याय लिख देगा। एक झटके में गला कटा, और कुछ ही पलों में जीवन की सारी संभावनाएं समाप्त हो गईं।
यह हादसा नहीं, एक पूर्व-लिखित त्रासदी है
हर वर्ष, हर मौसम, हर चेतावनी के बाद भी यह घटनाएं दोहराई जाती हैं। क्या यह महज संयोग है, या फिर एक सुनियोजित लापरवाही? प्रतिबंध के बावजूद बाजारों में चाइनीज मांझा ऐसे बिकता है जैसे कानून केवल दिखावे की वस्तु हो। व्यापारी वर्ग, जो लाभ के तराजू पर हर चीज को तौलने का आदी हो चुका है, क्या उसे यह एहसास नहीं कि उसके मुनाफे की चमक किसी के घर का चिराग बुझा रही है? या फिर यह मान लिया जाए कि लाभ की अंधी दौड़ में अब संवेदना जैसी कोई चीज बची ही नहीं?
प्रशासन: आदेशों का किला, जिम्मेदारी का शून्य
प्रशासन हर बार आदेश जारी करता है, चेतावनियां देता है, और फिर खुद को संतुष्ट कर लेता है कि कर्तव्य पूरा हो गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या कागज़ों पर लिखे गए आदेश कभी किसी की जान बचा पाए हैं? अगर प्रतिबंध है, तो फिर यह मांझा बाजार तक कैसे पहुंचता है? अगर नियम हैं, तो उनका पालन कौन करवा रहा है? या फिर यह मान लिया जाए कि जिम्मेदारी अब केवल घोषणाओं तक सीमित रह गई है?
समाज की चुप्पी: सबसे बड़ा अपराध
यह केवल प्रशासन या व्यापारियों की विफलता नहीं है। यह उस समाज की भी विफलता है, जो हर बार ऐसे हादसों को देखकर कुछ पल दुख जताता है और फिर भूल जाता है। पतंग काटने की क्षणिक खुशी के लिए हम यह भूल जाते हैं कि उसी मांझे की धार किसी की गर्दन भी काट सकती है। क्या हमारी खुशी अब इतनी क्रूर हो गई है कि उसमें किसी और के दर्द की कोई जगह नहीं बची?
एक सवाल, जो हर गली में गूंजना चाहिए
अगर यही घटना किसी प्रभावशाली व्यक्ति के परिवार के साथ होती, तो क्या हालात ऐसे ही रहते? क्या तब भी कार्रवाई इतनी धीमी और औपचारिक होती? यह सवाल केवल व्यवस्था पर नहीं, बल्कि हमारे पूरे तंत्र पर एक गहरा कटाक्ष है।
जागना ही विकल्प है
यह घटना एक चेतावनी है सिर्फ प्रशासन के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए जो इस खतरनाक मांझे को खरीदता, बेचता या उपयोग करता है। जब तक हम जागेंगे नहीं, तब तक यह अदृश्य धागा यूं ही मासूम जिंदगियों को काटता रहेगा।




