बीबीएन, बीकानेर, 28 जुलाई। कुछ दृश्य होते हैं जो शब्दों में नहीं उतरते, वे आंखों से बहते हैं और इतिहास के सीने में दर्ज हो जाते हैं। रविवार का दिन भानुदा गांव के लिए ऐसा ही एक दिन था — जब वायुसेना के शहीद लेफ्टिनेंट ऋषिराज सिंह के माता-पिता अपने लाल की आख़िरी निशानियों से मिलने पहुंचे।
9 जुलाई को जगुआर फाइटर प्लेन जब गांव की सीमा में गिरा था, तो आसमान ने जैसे एक दीपक बुझते देखा था। पर उस बुझते हुए दीपक ने अपने प्राणों की बाती जलाकर गांव के सैकड़ों घरों को रोशन रखा। ऋषिराज ने मात्र 23 वर्ष की आयु में वह कर दिखाया, जिसे सुनकर पत्थर भी पिघल जाएं — उन्होंने अपनी जान दी, पर गांव को कोई नुकसान नहीं दिया।
और अब जब मां-पिता उस स्थल पर पहुंचे, जहां ऋषिराज ने अपने प्राण त्यागे थे, तो वहां की राख भी मानो बोल रही थी — “यहां किसी ने खुद को जलाकर सबको बचा लिया।”
मां ने गंगाजल से उस जमीन को पवित्र किया, जिस पर बेटा अमर हो गया था। पिता ने जली हुई मिट्टी को अपनी हथेली में उठाया, जैसे बेटे की याद को अपनी सांसों में भर लेना चाहते हों। पर यह सिर्फ एक मिट्टी नहीं थी, यह उस शहादत का प्रमाण थी, जिसे कोई शब्द बयान नहीं कर सकते। यहां से लौटते हुए जब शहीद परिवार श्रीडूंगरगढ़ पहुंचा, तो गढ़-गोपाल रिसॉर्ट में आयोजित सम्मान समारोह में जैसे पूरा नगर उनके चरणों में झुक गया। समिति के सदस्यों ने कहा “इस देश के भाग्य में ऋषिराज जैसे बेटे तभी लिखे जाते हैं, जब कोई मां अपनी कोख से सैनिक नहीं, संकल्प को जन्म देती है।”
बजरंगलाल भामू, विमल भाटी, सत्यनारायण स्वामी, रणवीरसिंह खीची सहित कई जनप्रतिनिधियों ने परिवार को सम्मानित किया और कहा कि ऋषिराज केवल एक नाम नहीं, एक प्रेरणा हैं — जो अगली पीढ़ियों के रगों में देशभक्ति की चिंगारी बनकर दौड़ेंगे।
भानुदा के पूर्व सरपंच विजयपाल भुंवाल ने बताया कि विमान गिरने के अंतिम क्षणों में भी ऋषिराज ने गांव को बचाने के लिए विमान को खेतों की ओर मोड़ा — वह चाहता तो खुद को बचा सकता था, पर उसने गांव को चुना… और मृत्यु को गले लगाया।
ग्रामीणों ने बताया कि अब उस पवित्र स्थल पर शहीद स्मृति बनवाने की योजना है — ताकि भविष्य में कोई भी इस धरती पर आए तो जान सके कि यहां कोई ऋषिराज था, जिसने सब कुछ देकर सबको बचा लिया।
भानुदा से लौटते समय ऋषिराज का परिवार रामसरा स्थित अमर शहीद कैप्टन चंद्र चौधरी के स्मारक पर रुका। यहां ऋषिराज के पिता ने आंखें भरीं और कहा “ये बेटों की नहीं, माताओं की साझी पीड़ा है। जो पुत्र देश पर न्योछावर हुए हैं, वे अब केवल किसी घर के नहीं — पूरे भारतवर्ष के बेटे हैं।”


