बीबीएन, बीकानेर। फाल्गुन की हवा में घुली रंगों की गंध और ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच बीकानेर ने एक बार फिर अपनी लोकपरंपराओं का आंचल खोल दिया है। कीकाणी व्यासों के चौक में रात के सन्नाटे को चीरती जयकारों की गूंज, लटियाल माता के अवतरण का भावपूर्ण दृश्य और कृष्ण-राधा की पुष्प होली की मनोहारी झांकी ने शहर को भक्ति और उल्लास के रंग में रंग दिया। वहीं हर्ष और व्यास समाज के बीच खेला गया ‘पानी का डोलची मार’ खेल, परंपरा और सामुदायिक आत्मीयता का जीवंत प्रतीक बनकर उभरा।
जब चौक में उतरी आस्था
मध्यरात्रि के बाद जैसे ही लटियाल माता के अवतरण का क्षण आया, चौक में उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालुओं की आंखों में विश्वास की चमक तैर उठी। “म्हारी राय भवानी जागे…” जैसे लोकस्वर वातावरण में गूंजे तो लगा मानो पीढ़ियों की स्मृतियां एक साथ जीवित हो उठी हों। लोगों ने धोक लगाई, बच्चों के मंगल की कामना की और मन ही मन आने वाले वर्ष के सुख की प्रार्थना की।
जमनादास कल्ला की परंपरा से जुड़ी रम्मत में कृष्ण-राधा पर पुष्प वर्षा का दृश्य केवल मंचन नहीं था, वह लोकभावना का उत्सव था। फूलों की बौछार के बीच कलाकारों ने भक्ति, श्रृंगार और हास्य का ऐसा संगम रचा कि दर्शक देर तक उसी भाव में डूबे रहे।
रंग, रस और रिश्तों की गरमाहट
सुबह होते-होते चौक एक जीवंत रंगमंच में बदल गया। लटियाल कला केन्द्र के सांस्कृतिक कार्यक्रम में लोकगीतों और नृत्य की लय पर दर्शकों के चेहरे खिल उठे। कलाकार आशीष और उनकी मंडली ने पुष्प होली की झांकी में राधा-कृष्ण की चंचलता को सजीव कर दिया। बच्चों की खिलखिलाहट, बुजुर्गों की संतोषभरी मुस्कान और छतों से झांकती उत्सुक निगाहें—सब मिलकर इस आयोजन को सामूहिक स्मृति में दर्ज करती रहीं।
अस्थायी दुकानों पर गुजिया की खुशबू और रंग-बिरंगे खिलौनों की चमक ने चौक को मेले में बदल दिया। ख्याल-चौमासे सुनने के लिए घरों की छतों पर जमा भीड़ इस बात का प्रमाण थी कि लोककला आज भी लोगों के हृदय में जीवित है।
डोलची मार: परंपरा में छिपा अपनापन
हर्ष और व्यास समाज के बीच खेला गया ‘पानी का डोलची मार’ खेल केवल एक रस्म नहीं, बल्कि रिश्तों की सहजता का उत्सव है। हर्षों की ढाल पर जब दोनों पक्ष आमने-सामने हुए, तो प्रतीकात्मक वार के साथ जोश भरे स्वर गूंजे—पर उनमें प्रतिस्पर्धा से अधिक अपनापन था।
करीब दो घंटे तक चले इस आयोजन में हर आयु वर्ग के लोगों ने भागीदारी की। अंत में गुलाल उछालकर जब समापन की घोषणा हुई, तो वातावरण में एक संतोष का भाव था—जैसे परंपरा ने एक और वर्ष स्वयं को सुरक्षित कर लिया हो।
लोकधरोहर का जीवंत स्वर
बीकानेर की यह होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि स्मृतियों, आस्था और सामुदायिक एकता का पर्व है। रम्मत, ख्याल-चौमासे और डोलची मार जैसे आयोजन यह संदेश देते हैं कि आधुनिकता के बीच भी लोकसंस्कृति की जड़ें गहरी हैं। फाल्गुन की इस सुबह ने फिर साबित कर दिया कि जब परंपरा और संवेदना साथ चलती हैं, तो उत्सव केवल मनाया नहीं जाता—जीया जाता है।

