बीबीएन, नेटवर्क | एक अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक अध्ययन संस्था ने चेतावनी दी है कि दक्षिण एशिया आने वाले वर्षों में फिर बड़े सैन्य तनाव की ओर बढ़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ती आतंकी गतिविधियाँ, सीमावर्ती घटनाएं और कूटनीतिक अविश्वास 2026 तक सशस्त्र संघर्ष का कारण बन सकते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में सीमित सैन्य झड़पें, जवाबी कार्रवाई और वैश्विक शक्तियों की मध्यस्थता के बावजूद क्षेत्र की स्थिरता नाजुक बनी हुई है।
अमेरिका स्थित एक प्रमुख वैश्विक नीति अनुसंधान समूह की हालिया रिपोर्ट ने दक्षिण एशिया की सुरक्षा स्थिति को लेकर गंभीर चिंता जताई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से चला आ रहा तनाव एक बार फिर खुली सैन्य टकराव की शक्ल ले सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा पार आतंकवाद, स्थानीय हमलों और जवाबी सैन्य कार्रवाइयों का चक्र इस टकराव को हवा दे सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक, बीते वर्ष दोनों देशों के बीच सीमित अवधि का सैन्य संघर्ष इस बात का संकेत था कि हालात कितनी तेजी से बिगड़ सकते हैं। जम्मू-कश्मीर क्षेत्र में हुए एक बड़े आतंकी हमले के बाद भारत की ओर से की गई सख्त सैन्य कार्रवाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब नई दिल्ली आतंकवाद के मुद्दे पर किसी भी तरह की ढील के मूड में नहीं है। इसके बाद सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रोन गतिविधियां, निगरानी बढ़ना और सैन्य तैयारियों में तेजी देखी गई।
अध्ययन में यह भी उल्लेख किया गया है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई शक्तियाँ भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं, ताकि तनाव को पूर्ण युद्ध में बदलने से रोका जा सके। हालांकि, रिपोर्ट यह संकेत देती है कि यदि आतंकी घटनाओं की श्रृंखला जारी रही, तो किसी एक घटना से हालात नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं।
केवल भारत-पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के रिश्तों को लेकर भी रिपोर्ट में चिंता जताई गई है। दोनों देशों के बीच सीमा सुरक्षा, उग्रवादी संगठनों की मौजूदगी और जवाबी सैन्य कार्रवाइयों ने हालात को और जटिल बना दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि इन मोर्चों पर एक साथ बढ़ता तनाव पूरे क्षेत्र की शांति के लिए चुनौती बन सकता है।
रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि दक्षिण एशिया में स्थायी शांति के लिए केवल सैन्य संतुलन नहीं, बल्कि आतंकवाद पर निर्णायक कार्रवाई, क्षेत्रीय सहयोग और भरोसेमंद कूटनीति की आवश्यकता है। अन्यथा आने वाले वर्षों में यह इलाका एक बार फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बन सकता है।



