बीबीएन, नेटवर्क। भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) एक बार फिर देश में पॉलीमर (Plastic-Based) करेंसी नोट शुरू करने की संभावना पर विचार कर रहा है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने संकेत दिया है कि प्लास्टिक आधारित नोटों को लेकर प्रस्ताव फिलहाल शुरुआती चरण में है और इस पर तकनीकी तथा आर्थिक पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है। यदि योजना आगे बढ़ती है तो यह भारतीय मुद्रा प्रणाली में पिछले कई दशकों का सबसे बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि पॉलीमर नोट पारंपरिक कागजी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ, सुरक्षित और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहतर साबित हो सकते हैं। इससे नकली नोटों की समस्या पर अंकुश लगाने के साथ-साथ नोटों की बार-बार छपाई पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकेगा।
क्यों चर्चा में हैं पॉलीमर नोट?
भारत में वर्तमान में कपास आधारित विशेष कागज पर करेंसी नोट छापे जाते हैं। अधिक उपयोग के कारण छोटे मूल्यवर्ग के नोट अपेक्षाकृत जल्दी खराब हो जाते हैं, जिससे उन्हें बदलने के लिए बड़ी संख्या में नए नोट छापने पड़ते हैं। पॉलीमर नोट सामान्य कागजी नोटों की तुलना में कई गुना अधिक समय तक चल सकते हैं। दुनिया के कई देशों में पॉलीमर नोट पहले से सफलतापूर्वक प्रचलन में हैं। ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड, यूनाइटेड किंगडम, सिंगापुर और रोमानिया जैसे देशों ने वर्षों पहले प्लास्टिक करेंसी को अपनाया था।
नकली नोटों पर कैसे लगेगी रोक?
पॉलीमर नोटों में पारदर्शी विंडो, जटिल सुरक्षा डिजाइन, माइक्रो प्रिंटिंग और उन्नत होलोग्राफिक फीचर शामिल किए जा सकते हैं। इनकी नकल करना सामान्य कागजी नोटों की तुलना में कहीं अधिक कठिन माना जाता है। यही कारण है कि कई देशों ने नकली मुद्रा पर नियंत्रण के लिए पॉलीमर तकनीक को अपनाया।
पहले भी हो चुका है प्रयोग
आरबीआई ने वर्ष 2014 में भी कुछ शहरों में सीमित स्तर पर पॉलीमर नोटों के परीक्षण की योजना बनाई थी। हालांकि विभिन्न तकनीकी और लागत संबंधी कारणों से यह परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी। अब नई तकनीक और बेहतर उत्पादन क्षमता के चलते इस विषय पर फिर से विचार किया जा रहा है।
क्या होंगे संभावित फायदे?
नोटों की उम्र कागजी नोटों से कई गुना अधिक होगी।
नकली नोटों की पहचान आसान होगी।
नोट पानी, नमी और गंदगी से कम प्रभावित होंगे।
लंबे समय में छपाई और प्रतिस्थापन लागत घट सकती है।
सुरक्षा फीचर अधिक उन्नत बनाए जा सकेंगे।
क्या हैं चुनौतियां?
विशेषज्ञों के अनुसार पॉलीमर नोटों की शुरुआती उत्पादन लागत कागजी नोटों की तुलना में अधिक होती है। इसके अलावा एटीएम मशीनों, नोट गिनने वाली मशीनों और बैंकिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में भी कुछ तकनीकी बदलाव करने पड़ सकते हैं। इसलिए किसी भी निर्णय से पहले व्यापक परीक्षण और लागत-लाभ विश्लेषण आवश्यक होगा।
अर्थव्यवस्था और आम जनता पर क्या असर पड़ेगा?
यदि आरबीआई चरणबद्ध तरीके से पॉलीमर नोट लागू करता है तो शुरुआत में सीमित मूल्यवर्ग के नोट बाजार में लाए जा सकते हैं। इससे बैंकिंग प्रणाली को नई तकनीक के अनुरूप ढालने का समय मिलेगा। लंबे समय में इससे मुद्रा प्रबंधन अधिक कुशल, सुरक्षित और कम खर्चीला हो सकता है। वित्तीय विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल भुगतान के बढ़ते दौर में भी नकदी की भूमिका पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। ऐसे में अधिक टिकाऊ और सुरक्षित करेंसी नोट भारत की मुद्रा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं।



