बीबीएन, नेटवर्क | 11 दिसंबर को मनाया जाने वाला ओशो जन्मदिवस उस आध्यात्मिक परंपरा की स्मृति है जिसने मनुष्य को भय, बंधन और अंधानुकरण से मुक्त कर स्वतंत्र चिंतन, आंतरिक चेतना और प्रेमपूर्ण जागरण की दिशा दी। श्री रजनीश ध्यान मंदिर में आयोजित प्रेस वार्ता में ओशो के भाई डॉ. स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती ने कहा कि यह दिन केवल किसी आध्यात्मिक व्यक्तित्व का स्मरण नहीं, बल्कि उस ऊर्जा-प्रवाह का उत्सव है जिसने जीवन, ध्यान और गुरु-शिष्य संबंध की धारा को एक नई दृष्टि प्रदान की।
ओशो का संदेश: गुरु नहीं, जागरण का माध्यम
स्वामी शैलेन्द्र के अनुसार ओशो ने गुरु की पारंपरिक अवधारणा को बदलते हुए यह बताया कि गुरु किसी चमत्कार या बाहरी शक्ति का स्रोत नहीं, बल्कि चेतना को जगाने वाली उपस्थिति है। उनके अनुसार गुरु शिष्य पर बोझ नहीं डालता, बल्कि मन पर जमा भ्रमों की परत हटाकर मूल स्वभाव से परिचय कराता है। ओशो का मानना था कि आध्यात्मिकता किसी अनुशासन, कठोरता या भय का मार्ग नहीं बल्कि आनंद, स्वतंत्रता और आंतरिक सत्य की यात्रा है।
स्व-स्मरण ही सबसे बड़ा उपहार
ओशो के विचारों में ‘स्व-स्मरण’ अर्थात् स्वयं को शुद्ध साक्षी के रूप में पहचानना जीवन का सबसे बड़ा मोड़ है। उनका संदेश था कि मनुष्य शरीर, विचार, इतिहास या पहचान से परे एक स्वतंत्र चेतना है। यही जागरण जीवन को संघर्ष से उत्सव में बदल देता है।
आज की दुनिया में ओशो की प्रासंगिकता
भय, असुरक्षा और अकेलेपन से जूझती दुनिया में ओशो का संदेश ‘रुको और स्वयं को देखो’ पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो उठा है। वे कहते थे कि जिस शांति की खोज मनुष्य बाहर करता है, वह उसके भीतर ही छिपी है।
11 दिसंबर को सोनीपत में बड़ा उत्सव
ओशो के जन्मदिवस पर दीपालपुर, सोनीपत स्थित ओशो फ्रैगरेंस आश्रम में लगभग 700 साधक ध्यान, लाइव संगीत, नृत्य और मौन की साधना में सहभागी होंगे। यह आयोजन ओशो के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के साथ-साथ चेतना की सामूहिक ऊर्जा का उत्सव भी होगा।
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