बीबीएन, नेटवर्क। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आगामी अक्टूबर माह में एक बड़े आध्यात्मिक आयोजन की साक्षी बनने जा रही है। 1 से 4 अक्टूबर तक लखनऊ-कानपुर हाईवे स्थित आनंदी मैजिक वर्ल्ड रिसोर्ट में आयोजित होने वाले ‘गीता ध्यान-यज्ञ ओशो शिविर’ में देशभर से साधक, ओशो प्रेमी और आध्यात्मिक जिज्ञासु एकत्र होंगे। चार दिवसीय इस विशेष शिविर में ओशो के गीता-दर्शन के दस प्रमुख सूत्रों के माध्यम से ध्यान, आत्मबोध, मौन और चेतना जागरण की साधना कराई जाएगी। शिविर का मार्गदर्शन ओशो अनुज सद्गुरु स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती एवं माँ अमृत प्रिया करेंगे।
आयोजकों के अनुसार यह आयोजन केवल प्रवचन सुनने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रतिभागियों को ध्यान और आत्म-अनुभूति की ऐसी प्रक्रिया से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा, जो उनके जीवन-दृष्टिकोण में सकारात्मक परिवर्तन ला सके। तेजी से बदलती जीवनशैली, मानसिक तनाव और भौतिक व्यस्तताओं के बीच यह शिविर भीतर की शांति और जागरूकता की खोज का अवसर प्रदान करेगा।
ओशो के गीता-दर्शन के दस सूत्र होंगे केंद्र में
शिविर का मुख्य आधार ओशो की विश्वप्रसिद्ध प्रवचनमाला ‘गीता दर्शन’ है। लगभग 350 घंटों में दिए गए 219 प्रवचनों की इस श्रृंखला में ओशो ने भगवद्गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि चेतना के विज्ञान और जीवन के गहन मनोविज्ञान के रूप में व्याख्यायित किया है। स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती एवं माँ अमृत प्रिया ने इन विस्तृत प्रवचनों का सार दस प्रमुख सूत्रों में संकलित किया है। शिविर में अनासक्ति, अकर्म, स्वधर्म, निष्काम कर्म, ओंकार साधना, अद्वैत, अहंकार से मुक्ति और भीतर चल रहे संघर्ष में विजय जैसे विषयों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
लखनऊ की आध्यात्मिक विरासत को मिलेगा नया आयाम
लखनऊ सदियों से सांस्कृतिक, साहित्यिक और आध्यात्मिक चेतना का केंद्र रहा है। संत परंपराओं, सूफी विचारधारा और आध्यात्मिक विमर्शों की समृद्ध विरासत वाले इस शहर में आयोजित होने वाला यह शिविर आध्यात्मिक संवाद की एक नई धारा प्रवाहित करने वाला माना जा रहा है। आयोजकों का मानना है कि यह आयोजन केवल ओशो साधकों के लिए ही नहीं, बल्कि उन युवाओं और जिज्ञासुओं के लिए भी उपयोगी सिद्ध होगा जो जीवन के गहरे प्रश्नों के उत्तर खोज रहे हैं और ध्यान के माध्यम से स्वयं को समझना चाहते हैं।
‘भीतर के युद्ध’ को जीतने का संदेश
शिविर का केंद्रीय संदेश है कि जीवन से पलायन नहीं, बल्कि जागरूकता के साथ उसका सामना करना ही वास्तविक अध्यात्म है। अर्जुन का विषाद आज भी हर संवेदनशील व्यक्ति की दुविधा का प्रतीक है, जबकि श्रीकृष्ण का संदेश आत्मजागरण और चेतना के उत्कर्ष का मार्ग दिखाता है। इसी संदेश को ध्यान और अनुभव के माध्यम से साधकों तक पहुँचाने का प्रयास इस चार दिवसीय शिविर में किया जाएगा।


